पार

The river Banjar in Kanha National Park. Photograph: Sarabjeet Garcha, January 2014

व्यापार पार का प्यारा है

उद्घोष होश ने किए बहुत
सुननेवाला पर सुप्त रहा
उद्घाटित थी जो ठौर-ठौर
उस अनुकंपा को गुप्त कहा

उस अनबोले की मुट्ठी में
संसार सुगंधित तारा है

मेहमान द्वार से लौट गया
आहट तक उसकी पाई ना
छवि-अंकन में मन उलझा था
चलकर आया जब आईना

आ कांच आंच ले साथ गया
अब हाथों में बस पारा है

ताक़त कंधों की क्षीण हुई
ढो-ढोकर भार पराये-से
क़ीमत थी उन सब कर्मों की
जिनके विस्तारित साये थे

निर्भार करेगा वह जिस पर
पल-पल जीवन का वारा है

— सरबजीत गरचा (22 अक्तूबर 2017)

* क़रीब दो वर्ष पहले जब यह लिखा था, तब मन में बाबा नानक का ख़याल था. आस्था को आधार बनाकर लिखी गई ये पंक्तियां उन्हीं को समर्पित हैं.

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