पार

व्यापार पार का प्यारा है उद्घोष होश ने किए बहुत सुननेवाला पर सुप्त रहा उद्घाटित थी जो ठौर-ठौर उस अनुकंपा को गुप्त कहा उस अनबोले की मुट्ठी में संसार सुगंधित तारा है मेहमान द्वार से लौट गया आहट तक उसकी पाई ना छवि-अंकन में मन उलझा था चलकर आया जब …

सहारा/बहाना

सीढ़ियां हद से हद छत तक जाती हैं आसमान तक नहीं लेकिन तुम ज़रूर जा सकते हो आसमान तक ही नहीं उसके पार भी जो जितना सहारा है उतना ही बहाना भी सीढ़ियां नहीं पहुंचाती पहुंचते तुम ख़ुद हो — सरबजीत गरचा

क़ीमत

गाड़ी रुके न रुके हम तो रुक सकते हैं किसे पता यहां दो घड़ी बैठकर जो बात होगी उसकी कीमत गाड़ी में छूट चुके सामान से कहीं ज़्यादा हो शायद उस बेंच को थामे हुए कंक्रीट के फ़र्श की चमक तेज़ी से दौड़ती हुई खिड़की से दिखने वाले आसमान से …